इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव एवं माननीय न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद सम्मिलित हैं, ने 14 मई, 2026 को एक कड़े शब्दों में पारित आदेश में उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव (गृह) तथा महिला एवं बाल कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को तलब किया। न्यायालय ने एसिड अटैक पीड़िताओं के लिए व्यापक मुआवजा एवं पुनर्वास नीति निर्मित करने में राज्य की निरन्तर विफलता पर गहरी नाराजगी व्यक्त की अदालत ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा,

“जहां ऐसे जघन्य अपराध होते हैं जिनसे किसी नागरिक का जीवन स्थायी रूप से तबाह हो जाता है, वहां राज्य का संवैधानिक दायित्व केवल अपराधी पर मुकदमा चलाने तक ही सीमित नहीं है। राज्य का यह भी दायित्व है कि वह सार्थक पुनर्वास और पर्याप्त पुनर्स्थापनात्मक सहायता सुनिश्चित करे ताकि ऐसे अपराधों के पीड़ित भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त गरिमा के साथ जीवन जी सकें।”

 

याचिकाकर्ता फराहा, जो घटना के समय मात्र 24 वर्ष की थी, ने बताया कि उसे पीड़ित मुआवजा योजना के अंतर्गत 5 लाख रुपये तथा प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से 1 लाख रुपये — कुल मात्र 6 लाख रुपये — लगभग नौ वर्षों में प्राप्त हुए हैं। याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि 26 जुलाई, 2025 को उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को प्रतिवेदन दिए जाने के बावजूद आज तक कोई निर्णय नहीं लिया गया।

राज्य की ओर से अपर महाधिवक्ता श्री मनीष गोयल ने बताया कि गृह विभाग तथा महिला एवं बाल कल्याण विभाग व्यापक नीति के निर्माण पर सक्रिय रूप से विचार कर रहे हैं। किन्तु न्यायालय ने अपर मुख्य सचिव (गृह) द्वारा दाखिल शपथपत्र को असंतोषजनक पाया और कहा कि दस्तावेजों में केवल विभागों के बीच व्यापक विचार-विमर्श का उल्लेख है — न कोई ठोस नीतिगत ढाँचा, न कोई समयसीमा, न कोई पुनर्वास तंत्र।

न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय परिवर्तन केन्द्र बनाम भारत संघ (2016) 3 SCC 571 पर विश्वास व्यक्त किया, जिसमें यह प्रतिपादित किया गया था कि एसिड अटैक पीड़ितों को दिया जाने वाला मुआवजा एक सीमित या प्रतीकात्मक राशि तक नहीं रखा जा सकता और उसमें आजीवन पीड़ा, चिकित्सा व्यय, सामाजिक कलंक तथा सम्मान के साथ जीने की क्षमता के छिन जाने का हिसाब भी अवश्य लिया जाना चाहिए। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 का भी आह्वान करते हुए कहा कि राज्य का संवैधानिक दायित्व अपराधी के अभियोजन तक सीमित नहीं है — उसे पीड़िता के सार्थक पुनर्वास एवं सम्मान के साथ जीवन जीने की व्यवस्था सुनिश्चित करना भी उतना ही अनिवार्य है।

न्यायालय ने दोनों अधिकारियों को 25 मई, 2026 को ठोस नीतिगत ढाँचे, चिकित्सा उपचार व पुनर्निर्माण शल्यक्रिया की व्यवस्था, मनोवैज्ञानिक परामर्श, शिक्षा एवं रोजगार सहायता तथा मुआवजे के युक्तियुक्तकरण की प्रस्तावित व्यवस्था के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया।

 

Case Details:

Case No.: WRIT-C No. 5503 of 2026

Bench: Hon'ble Justice Saral Srivastava & Hon'ble Justice Garima Prashad

Petitioner: Faraha

Respondents: State of U.P. & 2 Others

Petitioner's Counsel: Ali Qambar Zaidi, Mohammad Danish, Mohammad Iliyas

Respondents' Counsel: C.S.C., Shreesh Srivastava

Order Link

Picture Source :